हिन्‍दी साहित्‍य, भारतीयता और साहित्‍य जगत की हलचल के प्रकाशन हेतु समर्पित मासिक पत्रि‍का

25 अक्तूबर 2011

चायल की स्‍मृतियाँ

चायल की स्‍मृतियाँ
चायल बस स्‍टैंड
ऐतिहासिक चायल पैलेस
विश्‍व प्रसिद्ध पर्यटक स्‍थल चायल हिमाचल प्रदेश के सोलन जनपद में स्थित है. यहां का नैसर्गिक सौंदर्य किसी को भी मोहित करने की शक्ति रखता है।  


चायल विश्‍व के सबसे ऊँचाई पर स्थित क्रिकेट मैदान के लिये जाना जाता है। अंग्रेजों ने गोरखों के खिलाफ लड़ाई में साथ देने के लिए महाराज पटियाला को चायल उपहार के तौर पर दिया था। 




सूखा बान का पेड़
 यह मैदान महाराजा पटियाला ने नहीं बनाया था, बल्कि इसे केवल संवारा था। इस बात के साक्ष्‍य मौजूद हैं कि 1893 में ही विश्व का सबसे ऊंचा क्रिकेट ग्राउंड यहां बन गया था। जो कि पहले एक चरागाह के रूप में प्राकृतिक तौर पर मौजूद था।
सिद्ध बाबा मंदिर के पास

सिद्ध बाबा मंदिर  चायल

शांति के क्षण
 आज इस मैदान की दशा देखकर आँखों में आँसू आ जाते हैं। मिल्‍ट्री स्‍कूल के नियंत्रण में होने के कारण इसकी हालत सचमुच दयनीय है। विकास नाम की तो कोई चीज ही नहीं है।
चायल से एक विहंगम दृश्‍य

ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब चायल
ऐतिहासिक बान (ओक) वृक्ष, जिस पर बने मचान पर बैठकर महाराजा कभी पहाड़ों का सौंदर्य निहारते थे, आज सूखी लकड़ी बन चुका है। मुझे याद है कि मैं बचपन में अपने पिता जी के साथ इस वृक्ष की मचान पर बैठ चुका हूँ।  

आज भी चायल का चप्‍पा चप्‍पा पटियाला के महाराजा भूपिंद्र सिंह की कहानी बयान करता है। उन्‍होंने वर्ष 1900 में राजगद्दी संभाली और 38 साल तक राजपाट किया। उन्होंने ऑनरेरी लेफ्टीनेंट कर्नल के तौर पर प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया था। 

उन्‍होंने लीग ऑफ नेशंज में 1925 में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था। महाराजा क्रिकेट के शौकीन थे। वर्ष 1911 में इंग्लैंड दौरे पर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान भी वही थे।



यह भी कहा जाता है कि महाराजा पटियाला शिमला स्थित वायसराय की बेटी पर इस कदर मोहित थे कि अपने प्यार को पाने के लिए ऐसा दुस्साहस दिखाया कि उसे वहां स्‍कैंडल प्‍वाइंट से उठा लिया और चायल ले आये। लेकिन ऐसी किसी घटना का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है कि भूपिंद्र सिंह ने वायसराय की बेटी को स्कैंडल प्वाइंट से उठाने का दुस्साहस किया था।

यहां पर सिद्ध बाबा मंदिर, काली टिब्‍बा, खडीवन, दोची, फनेवठी का चूड़धार प्‍वाइंट, ठंडी सड़क, गलू आदि देखने लायक स्‍थान हैं. यहां 1907 में बना एक अनुपम गुरुद्वारा भी है. 

31 अगस्त 2011

पचोले

परम्‍परागत हिमाचली व्‍यंजनः पचोले
पचोले
हिमाचल में हर मौसम और हर त्योहार के लिये अलग प्रकार के व्यंजन हैं। ऐसे ही लजीज़ व्यंजनों में से एक है-पचोले। भुट्टे के कच्चे दानों से बनाये जानेवाले कुछ परंपरागत व्यंजनों में से पचोले भी एक है। इसे बरसात के दिनों में तब बनाया जाता है जब खेतों में मक्की की फसल लहलहा रही होती है। आजकल पचोले बनाने के लिये सबसे उपयुक्‍त समय है। तो क्‍यों न इस अनूठे सरल हिमाचली व्‍यंजन के बारे में जाना जाये? बस एक बार आजमा कर देखिये, बार-बार खाने को मन करेगा।  
सामग्रीः
पचोले बनाने के लिये चाहिये कच्ची दूधिया मक्की के दाने और स्वाद के अनुसार नमक तथा थोड़ी सी हल्दी।
बनाने की विधिः
सबसे पहले मक्की के दूधिया दानों को सिल पर या ग्राइंडर में पीस लीजिये। स्वाद के अनुसार नमक और थोड़ी सी हल्दी भी उसमें डाल लें। सारी चीजों को मिला लीजिये। भुट्टे के बाहरी छिलकों को काटकर धो लें और उनके उपर मक्की के दानों के उपरोक्त पेस्ट को फैला लें। भुट्टे के बाहरी छिलकों के स्थान पर परंपरागत रूप से बिहुल के पत्तों का प्रयोग होता है। इन पत्तों को एक-एक करके सिड्डू मेकर या इडली स्टैंड में रखते जाएं और 15 मिनट तक भाप पर पकायें। बस पचोले तैयार हैं। जैसे ही आप ढक्कन खोलेंगे, पचोलों की खुशबू आपको सराबोर कर देगी। पचोले के नीचे चिपके पत्तों को अलग कर लें। 
खाने की विधिः
एक थाली में ताज़ा शुद्ध देसी घी लें और उसके साथ पचोले खाने का आनन्द प्राप्त करें। इसे खीर, दलिये या दही के साथ भी खाया जा सकता है।

27 जुलाई 2011

पतीड़


पतीड़
सामग्री :
अरबी के पत्ते-20, बेसन या मक्की का आटा-250ग्राम, नमक-स्वाद के अनुसार, मिर्च-आधा चम्मच, हल्दी-चुटकी भर, साबुत धनिया और साबुत लाल मिर्च, मेथी, प्याज, लहसुन, जीरा-एक चम्मच, तेल-एक कटोरी आदि।

बनाने की विधि :
सर्वप्रथम अरबी के पत्तों को पानी से अच्छी तरह से धो लें। अब बेसन या मक्की का आटा लीजिए और उसमें नमक, मिर्च, हल्दी, जीरा, धनिया, मेथी आदि मसाले डाल लें, फिर उसमें पानी डालकर अच्छी तरह से मिला लें। उसका हल्का सा घोल बना लें। साफ किए हुए अरबी के पत्तों को उल्टा करके उसमें बेसन का लेप लगा लें। तीन-चार पत्तों को इसी प्रकार लगाएं। फिर उन्हें फोल्ड करके बांध लें। इसी प्रकार तीन-चार पतीड़ों को इसी प्रकार लगा लें। अब एक सिडू-मेकर या इडली-स्टैंड पर भाप में पतीडों को पकाने के लिए रख दें और कम आंच पर 10-15 मिनट तक पकने दें। अब उसे निकाल कर ठंडा होने के लिए रख दें। थोड़ी देर बाद उसे काटकर छोटे-छोटे पीस करें। अब एक कढ़ाई में तेल डालकर उसमें साबुत धनिया और साबुत कटी हुई मिर्चें व प्याज, लहसुन डालें और उसको अच्छी तरह भूरे रंग का होने दें। थोड़े-थोड़े मसाले भी बाद में उसमें डालें। अब उसमें पतीड़ों को डालें। बस अब ये खाने के लिए तैयार हैं।
पतीड़ एक बरसाती व्यंजन है। इसे मध्य तथा ऊपरी हिमाचल में धिंधड़े भी कहते हैं। जिसे रिमझिम बरसती बरसात में खाने का अपना ही मजा है। गर्म सुगंधित देसी घी के साथ पतीड़ खाये जाते हैं। विकल्‍प के तौर पर इन्‍हें दही, लस्सी, मक्खन के साथ भी खाया जाता है।